VARN VYASVASTHA
वर्ण व्यवस्था क्या है ? इसका उत्तर हमें गीता के चौथे अध्याय के तेरहवे श्लोक में मिलता है. "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम" |जैसा भगवान् श्री कृष्णा कहते है की उन्होंने चार वर्णो की रचना की जिसमे "गुणकर्म विभागशः" लोगो के गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागो में बात गया है. तीन गुण होते है तामसिक, राजसिक, सात्विक.
गुण कर्मो के मापदंड है.
असल में आज के समय में मनुष्य अपने जीवनकाल में चारो वर्णो को भाग बारी बारी से बनता है . उदाहरण
१) जब मनुष्य १२ से १८ वर्ष के आयु में होता है उस वक्त वो अपने कर्म और गुणों के अनुसार शूद्र वर्ण के श्रेणी में आता है. क्योंकि इस आयु में बालक तामसी गुणों मैं जैसे की ( आलस्य, निद्रा , प्रमाद, कर्म में न प्रवृत्त होने का स्वभाव, जानते हुए भी अकर्तव्य से निवृत्ति न हो पाने की विवशता.आदि ) में विलीन रहता है.
२)क्रमशः जब वही मनुष्य अपने जीवन काल में २१ से ३५ वर्ष के बीच होता है उस दौरान उसके तामसी गुण घटने लगते है, तथा राजसी गुणों में जैसे की ( संपत्ति का संग्रह, इन्द्रियों पे सय्यम, आदि ) उसकी आसक्ति बढ़ने लगती है. और उसी दौरान उसमे सात्विक गुणों का भी अल्प प्रवेश होने लगता है.
३) और फिर जब वही मनुष्य अपने जीवन काल में ३५ से ६० वर्ष का होता है तो उसमे सात्विक गुणों की बाहुल्यता आजाती है और तामसी गुण शांत हो जाते है यानि की आलस्य समाप्त हो जाता है उस समय वो एक क्षत्रिय वर्ण में प्रवेश करता है और अपने धन संचय से अधिक अपने और अपने परिवार की सुरक्षा उसका प्रमुख दायित्व बन जाते है . जिसके लिए वो निरंतर शौर्यता , पीछे न हटने का स्वभाव, अपने परिवार के लिए या प्रजा के लिए प्राण न्योछावर करने का भाव सबसे ऊपर रखता है.
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